घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना
कुछ कहानियाँ पेट की भूख की नहीं होतीं — मन की भूख की होती हैं।
ये उन्हीं में से एक है। आख़िर तक ज़रूर पढ़िएगा।
मैं एक डिलीवरी बॉय हूँ। ज़्यादातर शाम और रात की शिफ्ट में काम करता हूँ। हर दिन की तरह उस दिन भी ऑर्डर पर ऑर्डर डिलीवर कर रहा था। रात के करीब 9 बजे मेरी शिफ्ट का आख़िरी ऑर्डर आया।
रेस्टोरेंट से पैकेट उठाया तो देखा—ऑर्डर बहुत साधारण था। एक सादा खिचड़ी, थोड़ा दही और दो केले।
पता शहर के पुराने हिस्से का था। पुरानी, जर्जर-सी इमारत। तीसरी मंज़िल। मैं सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा और डोरबेल बजाई।
कुछ सेकंड बाद दरवाज़ा खुला। सामने एक बुज़ुर्ग अम्मा खड़ी थीं। सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों पर मोटा चश्मा और चेहरे पर उम्र की थकान। लेकिन उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी मिठास थी।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, ज़रा खाना अंदर टेबल पर रख दो… हाथ थोड़ा काँपते हैं।”
मैंने खाना अंदर रख दिया और वापस मुड़ने लगा। तभी उन्होंने धीमे से पूछा,
“दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।”
मैंने घड़ी देखी। मेरी ड्यूटी ख़त्म हो चुकी थी। मैं थका हुआ था। घर जाने की जल्दी भी थी। लेकिन पता नहीं क्यों, उस दिन मैंने ‘ना’ नहीं कहा। मैं उनके सामने कुर्सी खींचकर बैठ गया।
कमरे में गहरा सन्नाटा था। दीवार पर लगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी-सी तस्वीर थी और सामने दीवार पर परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी हुई थीं।
अम्मा ने धीरे-धीरे खाना शुरू किया। हर दो-तीन कौर के बाद मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा देतीं। कुछ देर बाद बोलीं,
“जानते हो बेटा, मैं रोज़ बाहर से खाना नहीं मँगाती। आज बस मन किया कि किसी इंसान की आवाज़ सुन लूँ।”
मैं चुप रहा। उन्होंने दीवार पर लगी तस्वीरों की तरफ़ इशारा किया।
“ये मेरे पति हैं। रेलवे में नौकरी करते थे। पाँच साल पहले चले गए।”
फिर दूसरी तस्वीर की ओर देखते हुए बोलीं,
“ये मेरा बेटा है। कनाडा में रहता है। बहुत अच्छा है। हर महीने पैसे भेजता है।”
कुछ पल रुककर उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन इस बार उनकी आँखें भीग गईं।
“बस… समय नहीं भेज पाता।”
उनके इस एक वाक्य ने कमरे की हवा बदल दी। घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी।
फिर उन्होंने बेटी की तस्वीर दिखाई।
“ये बंगलुरु में रहती है। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए। बच्चे अगर उड़ना न सीखें तो माँ-बाप ने उन्हें पाला ही क्या?”
उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी। बस एक गहरा खालीपन था। कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे पूछा,
“तुम्हारी माँ हैं?”
“हाँ।”
“रोज़ बात करते हो?”
मैं जवाब नहीं दे पाया। सच तो यह था कि मैं भी कई-कई दिन घर फोन नहीं करता था। हर बार यही सोचता—आज बहुत थक गया हूँ, कल कर लूँगा। लेकिन वो ‘कल’ अक्सर नहीं आता था।
शायद उन्होंने मेरी ख़ामोशी पढ़ ली। उन्होंने बहुत धीरे से कहा,
“माँ-बाप पैसे नहीं गिनते बेटा…
आवाज़ गिनते हैं।”
उनके ये शब्द सीधे दिल में उतर गए।
खाना ख़त्म हुआ। उन्होंने पानी पिया और फिर अपने पर्स से 500 रुपये निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाए। मैंने तुरंत हाथ पीछे कर लिया।
“नहीं अम्मा, ये मैं नहीं ले सकता।”
वो मुस्कुराईं। “ये टिप नहीं है।” मैं चुप रहा। उन्होंने आगे कहा,
“ये उस आधे घंटे की कीमत है, जिसमें तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।”
मैंने फिर मना किया। तब उन्होंने कहा,
“ले लो बेटा। आज तुमने खाना नहीं पहुँचाया… साथ पहुँचाया है।”
इस बार मैं कुछ नहीं कह पाया। मैंने पैसे ले लिए। लेकिन उन्हें जेब में रखने की हिम्मत नहीं हुई। हाथ में ही पकड़े रहा। जाते-जाते उन्होंने एक बात और कही,
“घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना।”
उस रात मैंने बिल्डिंग के नीचे पहुँचकर बाइक स्टार्ट नहीं की। सबसे पहले माँ का नंबर मिलाया। फोन उठते ही उधर से आवाज़ आई, “अरे, आज अचानक? सब ठीक है ना?”
बस इतना सुनना था। गला भर आया। मैंने धीरे से कहा,
“हाँ माँ… बस आपकी आवाज़ सुननी थी।”
कुछ पल ख़ामोशी रही। फिर हमेशा की तरह माँ ने पूछा, “खाना खाया?” और मैं सड़क किनारे खड़ा-खड़ा रो पड़ा।
उस दिन के बाद मेरी एक आदत बदल गई। मैं रोज़ माँ को फोन करने लगा। और सिर्फ़ माँ ही नहीं, लोगों को भी अलग नज़र से देखने लगा। क्योंकि अब मुझे समझ आने लगा था कि हर डिलीवरी सिर्फ़ एक पैकेट नहीं होती।
किसी घर में दवा पहुँचती है।
किसी घर में उम्मीद।
किसी घर में इंतज़ार।
और किसी घर में सिर्फ़ एक इंसानी आवाज़ की ज़रूरत होती है।
अब मैं दरवाज़ा खुलते ही जल्दी में नहीं रहता। चेहरे देखता हूँ। आवाज़ें सुनता हूँ। कभी-कभी पूछ लेता हूँ, “सब ठीक है ना?”
ज़्यादातर लोग मुस्कुराकर ‘हाँ’ कह देते हैं। लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जो बता देते हैं कि उन्होंने पूरे दिन किसी से बात नहीं की।
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करीब दो महीने बाद उसी पते का फिर ऑर्डर आया। मैं खुशी-खुशी वहाँ पहुँचा। लेकिन इस बार दरवाज़ा अम्मा ने नहीं खोला। सामने पड़ोस वाली आंटी थीं। उन्होंने मुझे देखा और धीमे से कहा,
“अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं।”
मेरे कदम वहीं रुक गए। कुछ सेकंड तक मैं कुछ बोल ही नहीं पाया। फिर उन्होंने अंदर जाकर एक छोटा-सा लिफाफा लाकर मुझे दिया।
“ये तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं।”
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने लिफाफा खोला। अंदर वही 500 रुपये थे। और एक छोटी-सी पर्ची। उस पर लिखा था—
बेटा,
अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ।
उस रात मेरे साथ खाना खाने के लिए धन्यवाद। तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया।
और हाँ… माँ को फोन करते रहना।
— अम्मा
आज भी वो 500 रुपये मेरे बैग की अंदर वाली जेब में रखे हैं। मैंने उन्हें कभी खर्च नहीं किया। क्योंकि उस रात मुझे एक ऐसी बात समझ आई, जो शायद ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा।
हर दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक ग्राहक नहीं होता।
कभी एक माँ होती है।
कभी एक इंतज़ार।
कभी कोई अनकही तकलीफ़।
और कभी किसी की आख़िरी बातचीत।
हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं।
किसी को रोटी चाहिए।
किसी को दवा।
किसी को सहारा।
और किसी को सिर्फ़ दो मिनट का साथ।
क्योंकि इंसान को हमेशा पैसों की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी उसे बस किसी की मौजूदगी चाहिए होती है।
अगर ये कहानी आपके दिल को छू गई हो — तो आज ये पन्ना बंद करने से पहले एक काम ज़रूर कीजिए।
अपनी माँ को फोन कीजिए। बस इतना कहिए — “आपकी आवाज़ सुननी थी।”